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पितृ पक्ष 2026: जानिए इस वर्ष की मुख्य तिथियाँ, गया में पूर्वजों को 'बैठाने' का महत्व और यहाँ के अनूठे पौराणिक रहस्य

 लेखक: BP Live Media पढ़ने का समय: 5 मिनट

सनातन धर्म में माता-पिता और पूर्वजों की सेवा केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके जाने के बाद भी उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करना हमारा परम कर्तव्य माना गया है। हिंदू शास्त्रों में 'पितृ ऋण' को सबसे बड़ा माना गया है और पितृ पक्ष के ये 16 दिन इसी ऋण को चुकाने और पूर्वजों के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा जाहिर करने के लिए समर्पित हैं।

पितृ पक्ष में गया जी में फल्गु नदी के किनारे तर्पण करते श्रद्धालु।

जब बात पितृमुक्ति और मोक्ष की आती है, तो भारत के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालुओं के कदम बिहार के ऐतिहासिक और पावन गया तीर्थ की ओर बढ़ जाते हैं। 

आइए, इस लेख में वर्ष 2026 के पितृ पक्ष की मुख्य तिथियों के साथ-साथ गया जी के महत्व और वहाँ से जुड़े कुछ अद्भुत पौराणिक रहस्यों को विस्तार से जानते हैं।

📅 वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की मुख्य तिथियाँ 

इस वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर को होगा। यदि आप अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण या श्राद्ध कर्म करने जा रहे हैं, तो इन मुख्य तिथियों को अवश्य नोट कर लें: 26 सितंबर, शनिवार: पूर्णिमा श्राद्ध (पितृ पक्ष का प्रारंभ) 27 सितंबर, रविवार: प्रतिपदा श्राद्ध 10 अक्टूबर, शनिवार: सर्वपितृ अमावस्या (पितृ पक्ष का समापन)

1. पितरों को बैठाना" या गया सिरिजना क्या है?

लोक-परंपरा और आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि वे अपने पितरों को "बैठाने" गया जा रहे हैं। इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। मान्यता है कि जब तक किसी मृत व्यक्ति का गया जी में विधि-विधान से पिंडदान नहीं होता, तब तक उनकी आत्मा को पूर्ण मोक्ष नहीं मिलता और वे भटकती रह सकती हैं। गया में पिंडदान करने का सीधा अर्थ है—अपने पूर्वजों को भगवान विष्णु के चरणों (विष्णुपद) में हमेशा के लिए एक शांत और सुरक्षित स्थान दिला देना। इसके बाद पूर्वजों का भटकना बंद हो जाता है और वे देवलोक को प्रस्थान करते हैं।

गया जी में फल्गु नदी का तट और विष्णुपद मंदिर का दृश्य।

2. गया में पिंडदान के बाद नियमों में बदलाव 

गया श्राद्ध को महाश्राद्ध' कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ एक बार विधिपूर्वक पिंडदान हो जाने के बाद पूर्वजों को अक्षय तृप्ति मिल जाती है। इसके बाद वंशजों को हर साल तामझाम के साथ बड़ा 'पार्वण श्राद्ध' करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसके बाद के वर्षों में परिवार के लोग पितृ पक्ष में केवल उनके नाम से सामान्य जल का तर्पण करते हैं, घर पर धूप-दीप देते हैं या किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन कराते हैं।

3. फल्गु नदी का तट और माता सीता का श्राप 

गया जी में पिंडदान की शुरुआत पवित्र फल्गु नदी के किनारे से होती है। इस नदी का संबंध रामायण काल से है।बालू का पिंड: जब भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता राजा दशरथ का श्राद्ध करने गया पहुँचे, तब शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था। समय की महत्ता को देखते हुए माता सीता ने फल्गु नदी की बालू (रेत) से ही पिंड बनाकर राजा दशरथ की आत्मा को तृप्त कर दिया था।अंतःसलिला नदी का रहस्य: पौराणिक कथा के अनुसार, जब श्री राम वापस आए तो भय के कारण फल्गु नदी ने सीता जी द्वारा किए गए पिंडदान की बात से इनकार कर दिया (झूठ बोल दिया)। इस असत्य से क्रोधित होकर माता सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया कि तुम 'अंतःसलिला' रहोगी। यही कारण है कि आज भी यह नदी ऊपर से सूखी दिखाई देती है, लेकिन इसकी रेत को थोड़ा सा हटाने पर नीचे से पवित्र जल की धारा निकल आती है।

4. प्रेतशिला पत्थर: अकाल मृत्यु वाले पितरों का मोक्ष स्थल गया

अकाल मृत्यु से मुक्ति के लिए गया का प्रसिद्ध प्रेतशिला पर्वत।

 शहर से करीब 8-10 किलोमीटर दूर स्थित 'प्रेतशिला पर्वत' एक अत्यंत रहस्यमयी और महत्वपूर्ण वेदी है।अकाल मृत्यु से मुक्ति: जो पूर्वज किसी दुर्घटना, बीमारी, हत्या या आत्महत्या (अकाल मृत्यु) का शिकार हुए हों और जिनकी आत्मा प्रेत योनि में कष्ट पा रही हो, उनकी मुक्ति के लिए यहाँ पिंडदान अनिवार्य है।सत्तू उड़ाने की अनोखी परंपरा: इस पथरीले पहाड़ की चोटी पर स्थित विशाल चट्टान में कुछ प्राकृतिक दरारें हैं, जिन्हें परलोक का द्वार माना जाता है। यहाँ श्रद्धालु खोवे (मावे) और काले तिल का पिंड चढ़ाते हैं और पर्वत की परिक्रमा करते हुए हवा में जौ या चने का सत्तू उड़ाते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से भटकती आत्माओं की सदियों पुरानी भूख-प्यास तुरंत शांत हो जाती है।


प्रेतशिला पर्वत के पवित्र पत्थर पर पिंडदान और सत्तू अर्पण की परंपरा।


निष्कर्ष (Conclusion) गया तीर्थ और पितृ पक्ष का यह पावन संगम हमें सिखाता है कि हम चाहे जीवन में कितने भी आगे बढ़ जाएं, हमें अपनी जड़ों (Roots) को कभी नहीं भूलना चाहिए। वर्ष 2026 के इस पुण्य काल में गया की पावन भूमि पर जाकर फल्गु नदी के किनारे तर्पण करना और प्रेतशिला जैसे पवित्र स्थलों पर पिंडदान करना न केवल हमारे पूर्वजों को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करता है, बल्कि हमारे अपने जीवन में भी पितृ-आशीर्वाद से सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

❓ पितृ पक्ष और गया श्राद्ध से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: वर्ष 2026 में पितृ पक्ष कब से शुरू है और कब समाप्त होगा? 

उत्तर: वर्ष 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा।

प्रश्न 2: गया जी में पितरों को 'बैठाने' का वास्तविक अर्थ क्या है?

उत्तर: इसका अर्थ है भटकती हुई आत्माओं को विधि-विधान से पिंडदान देकर भगवान विष्णु के चरणों (विष्णुपद) में हमेशा के लिए शांत और सुरक्षित स्थान दिलाना, जिससे उन्हें पूर्ण मोक्ष मिल सके

प्रश्न 3: गया में प्रेतशिला पर्वत पर सत्तू क्यों उड़ाया जाता है?

उत्तर: प्रेतशिला पर्वत पर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों का श्राद्ध होता है। यहाँ की चट्टानों में प्राकृतिक दरारें हैं, जिन्हें परलोक का द्वार माना जाता है। यहाँ हवा में सत्तू उड़ाने से प्रेत योनि में भटक रहे पूर्वजों की सदियों पुरानी भूख-प्यास तुरंत शांत होती है।

प्रश्न 4: फल्गु नदी को माता सीता ने क्या श्राप दिया था?

उत्तर: माता सीता ने फल्गु नदी को 'अंतःसलिला' (जमीन के नीचे बहने) का श्राप दिया था क्योंकि नदी ने राजा दशरथ के पिंडदान के सच को श्री राम के सामने छिपाकर झूठ बोला था। इसी कारण यह नदी ऊपर से सूखी दिखती है।

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