छठ पूजा भारत के प्रमुख लोकपर्वों में से एक है। सूर्योपासना और छठी मैया की आराधना से जुड़ा यह पर्व अपनी सादगी, पवित्रता, कठिन व्रत और लोक आस्था के लिए विशेष पहचान रखता है।
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चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और नियम-संयम के साथ सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।
छठ पूजा को खास तौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन समय के साथ इसका विस्तार देश के अनेक हिस्सों में हुआ है। अब दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, सूरत, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में भी छठ पूजा के सामूहिक आयोजन देखने को मिलते हैं।
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छठ पूजा क्यों मनाई जाती है?
छठ पूजा सूर्यदेव की उपासना का पर्व है। भारतीय परंपरा में सूर्य को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश का आधार माना गया है। इसी श्रद्धा के साथ व्रती सूर्यदेव को अर्घ्य देकर परिवार के सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और मंगल की कामना करते हैं।
इस पर्व में छठी मैया की भी विशेष पूजा की जाती है। लोकमान्यता के अनुसार छठी मैया संतान और परिवार की रक्षा तथा सुख-समृद्धि से जुड़ी देवी के रूप में पूजनीय हैं।
छठ पूजा का इतिहास और लोक परंपरा
छठ पूजा की परंपरा बहुत प्राचीन मानी जाती है। सूर्योपासना की परंपरा भारतीय संस्कृति में लंबे समय से चली आ रही है। छठ पर्व इसी सूर्य आराधना से जुड़ी एक विशिष्ट लोक परंपरा के रूप में विकसित हुआ।
छठ से जुड़ी लोककथाओं में भगवान राम और माता सीता तथा महाभारत काल की द्रौपदी और कर्ण से संबंधित प्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि इन कथाओं के अलग-अलग लोक रूप प्रचलित हैं और इनके आधार पर छठ की उत्पत्ति की एक ही ऐतिहासिक कहानी तय करना उचित नहीं है।
छठ पूजा कितने दिनों की होती है?
छठ पूजा सामान्यतः चार दिनों तक चलती है। प्रत्येक दिन का अपना अलग महत्व और अनुष्ठान होता है।
पहला दिन: नहाय-खाय
छठ पर्व का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है। इस दिन व्रती स्नान आदि के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। घर और पूजा से जुड़े स्थानों की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।
नहाय-खाय के साथ ही छठ के लिए आवश्यक नियम और संयम का पालन शुरू हो जाता है।
दूसरा दिन: खरना
दूसरे दिन खरना होता है। इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और शाम को पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं।
खरना के प्रसाद में कई स्थानों पर गुड़ की खीर, रोटी या अन्य पारंपरिक प्रसाद बनाए जाते हैं। क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार प्रसाद में अंतर हो सकता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन छठ पूजा का सबसे प्रमुख अनुष्ठान होता है। व्रती और परिवार के सदस्य छठ घाट, नदी, तालाब या अन्य जलाशयों के किनारे पहुंचते हैं और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं।
इस दौरान घाटों पर दीप, सूप और प्रसाद से सजी टोकरी के साथ श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ दिखाई देती है। लोकगीतों और छठी मैया की जय-जयकार से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण
चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसे उषा अर्घ्य कहा जाता है।
उषा अर्घ्य के बाद व्रती पारण करते हैं और इसी के साथ चार दिवसीय छठ पर्व का समापन होता है।
छठ पूजा में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा
छठ पूजा की सबसे विशिष्ट परंपरा सूर्यदेव को अर्घ्य देना है। इसमें डूबते और उगते—दोनों सूर्य की उपासना की जाती है।
संध्या अर्घ्य में अस्त होते सूर्य को नमन किया जाता है, जबकि अगले दिन उषा अर्घ्य में उगते सूर्य की आराधना की जाती है। यह परंपरा छठ पूजा को अन्य पर्वों से अलग पहचान देती है।
छठ पूजा में क्या-क्या प्रसाद चढ़ाया जाता है?
छठ पूजा के प्रसाद में क्षेत्रीय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। सामान्य तौर पर पूजा में ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल, केला, मिठाई और अन्य पारंपरिक सामग्री का उपयोग किया जाता है।
प्रसाद को साफ-सफाई और शुद्धता के साथ तैयार करना इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
छठ घाटों का महत्व
छठ पूजा में घाटों की विशेष भूमिका होती है। नदी, तालाब या अन्य जलाशयों के किनारे बनाए गए छठ घाटों पर व्रती सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।
पर्व के दौरान घाटों की साफ-सफाई, रोशनी, सुरक्षा, आवागमन और भीड़ प्रबंधन जैसी व्यवस्थाएं भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन, पुलिस और सामाजिक संगठन मिलकर तैयारियां करते हैं।
छठ पूजा अब देशभर में
छठ पूजा का विस्तार अब पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर देश के अनेक हिस्सों तक पहुंच चुका है। रोजगार, शिक्षा और अन्य कारणों से अलग-अलग शहरों में रहने वाले बिहार, पूर्वांचल और झारखंड के परिवार अपनी लोक परंपराओं को वहां भी आगे बढ़ा रहे हैं।
इसी के साथ दिल्ली, मुंबई, पुणे, सूरत, अहमदाबाद, कोलकाता और देश के अन्य शहरों में भी छठ घाटों पर सामूहिक आयोजन होने लगे हैं।
इस विस्तार ने छठ पूजा को केवल एक क्षेत्रीय पर्व के बजाय देश के व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य में भी एक महत्वपूर्ण पहचान दी है।
छठ पूजा की खासियत क्या है?
छठ पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सादगी, स्वच्छता, अनुशासन और लोक सहभागिता है। इसमें दिखावे की अपेक्षा नियम, श्रद्धा और सामूहिक आस्था को अधिक महत्व दिया जाता है।
परिवार के सदस्य व्रती के साथ मिलकर पूजा की तैयारियों में भाग लेते हैं। यही सामूहिकता इस पर्व को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी विशेष बनाती है।
छठ पूजा और लोक संस्कृति
छठ पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। इससे लोकगीत, पारंपरिक प्रसाद, घाटों की सजावट, पारिवारिक परंपराएं और सामुदायिक सहभागिता भी जुड़ी हुई हैं।
छठ के लोकगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस पर्व की सांस्कृतिक स्मृति को आगे बढ़ाते रहे हैं। यही वजह है कि देश के अलग-अलग शहरों में पहुंचने के बावजूद छठ पूजा से जुड़ी कई मूल परंपराएं आज भी कायम हैं।
निष्कर्ष
छठ पूजा सूर्यदेव की आराधना, छठी मैया के प्रति श्रद्धा, परिवार की मंगलकामना और लोक संस्कृति का अनूठा संगम है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व नहाय-खाय से शुरू होकर खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य के बाद पूर्ण होता है।
समय के साथ छठ पूजा का दायरा लगातार बढ़ा है। आज यह भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों को अपनी लोक परंपरा और आस्था से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पर्व बन चुका है।
BP Live Media पर छठ पूजा से जुड़ी तारीखों, पूजा विधि, स्थानीय घाटों, तैयारियों और आयोजन की खबरों का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
